बीकानेर, बच्चों में बढते वीडियो गेम के प्रति लगाव से वे हिंसक प्रवत्ति के हो सकते हैं। हिंसा में वीडियो गेम्स की भूमिका की भले ही कम चर्चा हो लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों के अविकसित मन में हिंसा के प्रति आकर्षण पैदा करने के कारण इनकी अनदेखी नहीं की जा सकती और कानून के जरिए इस पर लगाम कसने की जरूरत है। विश्व में वीडियो गेम्स का इतिहास सार के दशक से देखने को मिलता है। दुनिया का पहला हिंसक वीडियो गेम पैक मैन माना जाता है। इसके बाद कई हिंसक गेम्स बाजार में आये जो स्क्रीन पर मार-धाड या प्रतिद्वंद्वी खिलाडी को मार गिराने से जुडे रहे। वीडियो गेम्स के बच्चों पर असर को बताते कई शोध हो चुके हैं। वेबसाइट साइकोमैटर्स डाट काम के अनुसार वीडियो गेम्स बच्चों को काफी ज्यादा मशगूल कर देते हैं, उनमें हिंसक व्यवहार प्रेरित करते हैं जिसके बाद बच्चे असल जीवन में भी वैसा ही बर्ताव करने लग जाते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि बच्चों को हिंसक वीडियो गेम्स से दूर रखने के लिए सरकार के स्तर पर तो नियमन की जरूरत है ही, अभिभावकों को भी शिक्षित करने की आवश्यकता है। माता-पिता को यह बताया जाना चाहिए कि जिस तरह से वे अपने धर्म या संस्कृति के बारे में बच्चों को सिखाते हैं उसी तर्ज पर उनसे हिंसक वीडियो गेम्स से भी बचने को कहें।
जानकारों का मानना है कि बाल मन सभी प्रकार के दृश्य-श्रव्य माध्यमों के जल्द प्रभाव में आ जाता है। ऐसे में हिंसक दृश्य देखने पर उनके मस्तिष्क पर इसका दूरगामी प्रभाव पडता है। मस्तिष्क में आपस में जुडाव कुछ इस तरह का होता है कि वे हिंसक दृश्य देखने के बाद उसी तरह का बर्ताव करने की कोशिश कर सकते हैं। उन्होंने कहा- हिंसक वीडियो गेम्स का ही असर होता है कि बच्चों में बाद में आक्रामक या हिंसक रवैया देखा जाता है। वह जिंदगी को भी उसी अंदाज में लेते हैं।
वैसे वीडियो गेम्स के बाजार में नई तकनीकें आती जा रही हैं। जहां टच स्क्रीन वाले वीडियो गेम्स सभी वर्ग के लोगों के बीच खासे लोकप्रिय हैं वहीं आने वाला समय वर्चुअल गेम्स का बताया जाता है। विशेषज्ञ कहते हैं कि टच स्क्रीन वाले वीडियो गेम्स बच्चों में लोकप्रिय हैं लेकिन आने वाला समय वर्चुअल गेमिंग का होगा। इसमें गेम्स शरीर के संचालन के अनुसार खेले जायेंगे। उन्होंने कहा कि वर्तमान में रेसिंग गेम्स सभी वर्ग के लोगों के बीच लोकप्रिय हैं लेकिन हिंसक वीडियो गेम्स की मांग में भी कमी नहीं आई है। कुछ देशों में सरकारें रेटिंग प्रदान करती हैं ताकि बच्चों की उनके आयु वर्ग के मुताबिक ही वीडियो गेम्स तक पहुंच हो। 1या भारत में भी ऐसा कुछ है, ऐसा कोई नियम भारत में नहीं है। उनका कहना है कि अगर वीडियो गेम्स के क्षेत्र में भी आयुवर्ग के मुताबिक प्रमाणन हो तो यह एक अच्छा कदम होगा।