बीकानेर, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली की भारतीय साहित्य के निर्माता श्रृंखला के अन्तर्गत बीकानेर के राजस्थानी भाषा के दिवंगत साहित्यकार मुरलीधर व्यास ‘राजस्थानी‘ के जीवन और साहित्यिक अवदान पर एक मोनोग्राफ पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित किया गया है।एक सौ पैतीस पृष्ठों की इस मोनोग्राफ पुस्तक के लेखक आलोचक एवं साहित्यकार भवानीशंकर व्यास ‘विनोद‘ हैं।
साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित इस मोनोग्राफ में स्वर्गीय मुरलीधर व्यास ‘राजस्थानी‘ की साहित्यिक यात्रा का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि व्यास जी ने सन् 1930 से राजस्थानी भाषा में लिखने बोलने का संकल्प लिया और जीवन पर्यन्त फरवरी, 1984 तक अखण्ड साधना के रूप में साकार किया। आधुनिक राजस्थानी साहित्य और राजस्थानी भाषा की एक रूपता के आन्दोलन के वे अग्रिम योद्धा थे। प्रसिद्ध भाषा शास्त्री
सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या ने उन्हें शरतचंद्र का भाव शिष्य माना और लिखा कि व्यास जी ने राजस्थानी भाषा साहित्य में सामाजिक सरोकारों पर उल्लेखनीय लेखन किया है। उनकी लेखनी में शरत बाबू की उदार दृष्टि और उनकी चरित्र-विश्लेषण विषयक प्रतिभा की ज्योति राजस्थान की घरेलू बातों पर नितांत सार्थक भाव से अभिव्यक्त होती है। उन्होंने सच्चे अर्थो में मरूभारती का गौरव बढाया। प्रोफेसर नरोतमदास स्वामी ने व्यास जी को राजस्थानी का प्रथम कहानीकार माना। डाक्टर मनोहर शर्मा ने व्यास जी को नवीन कथा शैली कख्ख जनक माना।
इस मोनोग्राफ में व्यास जी के समकालीन लेखकों और विद्वानों के अभिमत का उल्लेख करते हुए कहा गया है, कि व्यास जी राजस्थानी के प्रथम कहानीकार, गद्य की नई शैली के जनक, शरतचन्द्र के भाव शिष्य, मुहावरां के संग्राहक एकांकी नाटक की सूत्रधार राजस्थानी भाषा के भागीरथ, भाषा की एकरूपता के चिंतक और प्रेरणादायक थे। उनमें विविध रूप समाये हुए थे प्रसिद्ध लेखक यादवेन्द्र शर्मा ’चंद्र‘ के शब्दों में व्यास जी की कहीं कहानियां रवीन्द्र नाथ टैगोर जैसी लगती है। डॉ मोती मेनारिया ने व्यास जी को राजस्थानी साहित्य का स्तम्भ माना। प्रोफेसर माधोदास व्यास ने व्यास जी को राजस्थानी साहित्य का प्रकाश पुंज और हिन्दी के सशक्त लेखक बताया। आधुनिक राजस्थानी साहित्य के निर्माताओं में प्रमुख स्थान माना। कथाकार और आलोचक नन्द भारद्वाज ने व्यास जी को राजस्थानी कहानी लेखन का प्रथम पुरूष माना । श्रीलाल नथमल जोशी ने व्यास जी को राजस्थानी भाषा साहित्य में बेन यहूदा की संग्या दी है। बेन यहूदा ने भी प्रतिज्ञा की थी कि वे अपनी मातृ भाषा हिब्रू के अलासा दूसरी भाषा में बात नहीं करेंगे। वे जीवन भर उस पर अटल रहे, उसी तरह व्यास जी ने भी राजस्थानी भाषा के प्रति अपने संकल्प को जीवन पर्यन्त फलीभूत किया। डॉ. मनोहर शर्मा के शब्दों में व्यास जी राजस्थानी भाषा साहित्य की उन्नति के लिए जीवन भर तपस्या करते रहे, उनकी तपस्या का ही सुफल है कि आज उनसे प्रेरणा लेकर राजस्थानी साहित्य में अनेक लेखक अपनी मातृभाषा के साहित्य भण्डार को विविध प्रकार की नई-नई रचनाओं से समृद्ध कर रहे हैं । इस पुस्तक में डॉ. मनोहर शर्मा द्वारा व्यास जी पर लिखे दोहों को भी प्रकाशित किया गया है। जिसमें एक बानगी - धीर वीर धुन रो धणी राजस्थानी व्यास, मरूवाणी साहित्य रो दीपायो इतिहास।