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RSS Wednesday, September 08, 2010
10
Nov
घडसाना एक तस्वीर
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Shyam Narayan Rangaघडसाना आन्दोलन में जहां किसान पानी की लडाई लड रहा है वहीं राजनैतिक पार्टीयाँ अपने वजूद की लडाई लड रही हैं। पानी में लगी इस आग में हर कोई अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेंकने में लगा है। ऐसा नही है कि जनता की किसी को कोई चिन्ता नहीं है लेकिन यह अवश्य है कि चिन्ता करने वाले नेता इस बार खुद चिन्ता मे फंसे हैं। मौका है अपने को जनता के ज्यादा करीब दिखाने का क्योंकि जो जनता से जुडा है वहीं तो नेता है। आईये देखते हैं घडसाना आन्दोलन का राजनैतिक पहलू हमारे प्रबन्ध सम्पादक श्याम नारायण रंगा की नजर से।

गंगानगर के घडसाना में किसानों का गुस्सा अपने पूरे उबाल पर है। किसानों का पानी को लेकर यह आंदोलन पिछले दो साल से चल रहा है। इस आंदोलन में अब तक सात किसान अपनी जिंदगी गंवा चुके ह। मामला गभीर है। प्रशासन कठोर। सरकार सन्न है। आखिर ऐसा क्या हो रहा है घडसाना, रावला, खाजूवाला में व इंदिरा गाँधी नहर के प्रथम चरण के किसानों के साथ।
आदमी का जीवन अमूल्य है। घडसाना, रावला, खाजूवाला व इस क्षेत्र का किसान आखिर मौत को हँस कर गले लगाने को क्यों तैयार है। आखिर ऐसे क्या हालात बन रहे हैं। जीवन को छोडकर मौत को चुनना कोई आसान बात नहीं है। यह अनमोल जीवन कोडयों के भाव क्यों लगा है।
क्या हो रहा है घडसाना के किसानों के साथ। क्यों बिगडे हुए हैं हालात । क्या है जमीनी हकीकत। क्यों है प्रशासन भी खौफजदा। क्या कारण है किसान के निर्भय होने का।
ये व प्रश्न है जो आज आम नागरिक के दिमाग में आ रहे हैं। मैंने स्वयं हालात मौके पर जाकर देखे हैं। किसानों के चेहरे पर कोई सिकन नहीं है। मौत का खौफ नही है। हां, प्रशासन के आला अधिकारी चाहे वह कलक्टर है या कमीशनर भयभीत जरूर नजर आ रहे हैं।
गंगानगर ऐसा इलाका है जह इंदिरा गांधी नहर का पानी किसानों को मिलता है। यह नहर प्रशासन व वितरण की सुविधा से दो भागों में बंटी हुई है। गंगानगर का यह इलाका नहर के प्रथम चरण में शामिल है। नहर के प्रथम चरण का किसान आंदोलित ह। मरने व मारने पर उतारू ह। पानी की मांग के वास्ते किसान को कभी इतना उग्र नहीं देखा है।
राजस्थान का इतिहास पानी की कमी का इतिहास रहा है लेकिन आज तक ढूंढने पर से भी पानी के लिए गृहयुद्ध जैसे हालात देखने, पढने व सुनने को नहीं मिलते वास्तव में हालात खराब है। संवादहीनता ने माहौल और बिगाड रखा है। किसानों ने जो सोच कर यहाँ जमीनें खरीदी थीं आज हालात उनके विपरीत है। किसानों कों पूरा पानी नहीं मिल रहा। पानी मिल तो रहा है लेकिन उतना नही जितना उन्हें चाहिए। किसानों के पास और कोई रास्ता नहीं हैं। मरना तो है ही अगर पानी नहीं मिला तो कर्ज के बोझ से मर जाएगा, भूख से मर जाएगा, यही सोच है किसानों की। गांवों में किसानों से बात करने पर यही बात सामने आई। किसान के पास आंदोलन और संघर्ष के अलावा कोई विकल्प नही है। अगर मरना है तो संघर्ष करके मरना है और जब मरने पर घर परिवार को पाँच लाख रूपये मिल रहे हो आश्रित को नौकरी मिल रही हो तो मरना सार्थक लगता है। मेरे कहने का मतलब यह नहीं है कि किसान पैसे के लिए मर रहा है। यह किसानों का कहना है कि अगर मर कर पीछे से घर वालों को सुकून मिलता है तो मर जाओ। स्पष्ट हैं कि अंदर से कितना दुखी है किसान। कोई ऐसे ही नहीं आता सडकों पर। कोई ऐसे नहीं पसारता अपनी छाती बंदूक की गोली के सामने। कोई ऐसे ही नहीं तोडता कफ्र्यू। किसान जानता है कि कफ्र्यू तोडने पर क्या होता है फिर भी वह ऐसा कर रहा है। धरती पुत्र इतना मुर्ख नहीं है। सरकार को सोचना होगा कि आखिर ये हालात क्यों बन रहे हैं। कहीं न कहीं गलती सरकार की है। संवादहीनता मेरी नजर में सबसे बडा कारण है। प्रशासन के अधिकारी नेताओं व जनता के बीच सेतु का काम करते हैं। यह सेतु मजबूत होना चाहिए। टिकाऊ होना चाहिए। आखिर ऐसा क्या डर है सरकार को, सरकार के नुमाइंदों को कि वे बात तक करने को तैयार नहीं। ऐसी नहीं होती लोक कल्याणकारी सरकारें। संवाद होना चाहिए। इसी जनता ने सरकार बनाई है। फिर जनता से कैसा डर। जन प्रतिनिधि जनता के बीच जाए बात करे तो मामला बन सकता है। मैंने कहा कि प्रशासनिक अधिकारी सेतु होते हैं। अगर हालात बिगडे है मतलब सेतु कमजोर है। किसान का दर्द जायज है। मैं स्वयं वहां गया ह। पत्रकार की नजर से हीन ही वरन् एक संवेदनशील इंसान की ’दीठ‘ से देखा है। किसान की बात सुनने वाला कोई नहीं है। उसके पास नेतृत्व नहीं है। उनके नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया है। नेतृत्व विहीन समुदाय भीड है। भीड के दिमाग नहीं होता। यह बात सब जानते हैं। सरकार को चाहिए कि वह संवाद की स्थिति कायम करे। समस्या का हल निकाले। अन्यथा जानें जाएगी। क्योंकि किसान को मौत का डर नहीं रहा। वह लाशें ढो रहा है। मौत क साथ लेकर चल रहा है। क्यों डरे वह किसी से! यह जमीन इन धरतीपुत्रों की है यह सरकार इनकी हैं अधिकारी इनके हैं तो फिर टकराव क्यों। जबाब वही संवादहीनता।
किसान का दर्द अधिकारियों का बर्ताव उन्हें कचोटता है। हालात बिगडते हैं। वह लाठीचार्ज होता है यह बात तो समझ में आती है लेकिन घरों में से महिलाओं व बच्चों को निकाल कर निर्ममता से पीटना। यह जुल्म है। घर में काम कर रही औरत को घर से निकाल कर मारना। छोटे छोटे मासूम बच्चों को मारना वह भी बिना वजह। सिर्फ यह जताने के लिए कि प्रशासन सख्त है। जायज नहीं है। किसी सूरत में जायज नहीं है। हुकूमत की तानाशाही कही जाएगी। जमीनी हकीकत बयान कर रहा हूँ। गाँवों में घूम कर आया ह। आम किसान से बात की है। असली दर्द यहीं है। अपनी मग को उठाना व उसे रखना उसके बदले में इतना आतंक। यही कारण है कि अब किसान को डर नहीं रहा। डर अपनी सीमाए लांघ कर बेखौफ हो चुका है। मौत को गले लगाया है किसानों ने करीब से देखा है। कोई अपना हाथ दिखाता है कि यहाँ लगी थी गोली कोई पाँव दिखाता है कोई पीठ दिखाता है तो उन्होंने मौत को जी लिया डर हट गया। हालात यह तक क्यों पहचे। वही संवादहीनता।
सरकार को चाहिए कि वह किसान का दर्द समझे। सरकार बडी है लोकतंत्र का परिणाम है तो लोक को खुश रखा जाए। अगर ऐसा नहीं होता है तो और जाने जाएगी और कारण बनेंगे और परिणाम होंगे। लेकिन विश्व बैंक के उपाध्यक्ष इस्माइल सेरागेलिडन को यह उक्ति संभव होनें में अधिक दिन नहीं लगेंगे। जिसमें उन्होंने कहा कि अगर तीसरा विश्व युद्व होगा तो किसी अन्य कारण से नहीं वरन् पानी के कारण से। सोहेला,घडसाना आदि आंदोलन इस महाविस्फोट की पूर्व ध्वनियाँ है। हमें समय की आहट को सुनना चाहिए और उसके अनुसार अपने आस पास की व्यावहारिक समस्याओं को निपटानें के कारगर उपाय करने चाहिए।

आइये अब देखते है कि पानी मे लगी इस आग के पीछे क्या राजनीति चल रही है। कौनसी पार्टी क्या खेल खेल रही है!

घडसाना आंदोलन का राजनैतिक पहलू
राजस्थान का गंगानगर व बीकानेर क्षेत्र का इलाका वर्तमान में पानी की आग से जल रहा हैं। यहां के किसान पानी की मांग को लेकर आंदोलित हैं। किसानों की इस स्थिति से आज पूरा देश वाकिफ हैं। किसानों का नेतृत्व यहां के क्षेत्रीय नेता ही कर रहे हैं। कामरेड हेतराम बेनीवाल, साहेबराम पूनिया, बल्लभ कोचर, संतलेखा सिंह वे नाम है जो इस आंदोलन से शुरू से जुडे ह। इस आंदोलन का नेतृत्व शुरू से ही कामरेड कर रहे हैं। आंदोलन का राजनैतिक फायदा उठाने का प्रयास कांग्रेस ने भी किया लेकिन पिछली बार वह इसमें असफल रही। अब काँग्रेस पूरा प्रयास कर रही है कि आन्दोलन को अपने हाथों में ले ले।
यह आंदोलन जब पिछली बार शुरू हुआ था तो कामरेडों के हाथ में था। चूंकि यह मामला स्थानीय लोगो से जुडा था व जमीनी हकीकत का मामला था, इसलिए इस क्षेत्र के कांगेसी नेता भी आन्दोलन से जुड गए। लेकिन पिछली बार प्रदेश स्तर पर कांग्रेस खुल कर साथ नहीं आई। कांग्रेस के बडे नेताओं ने रावला, घडसाना के दौरे जरूर किए, लेकिन जब जयपुर में किसानों का महापडाव डाला गया और गंगानगर व बीकानेर क्षेत्र के लाखों किसान पडाव डाले जयपुर में बैठे रहे तो कांग्रेस ने पांव पीछे ले लिये। तत्कालिन प्रतिपक्ष नेता बी.डी. कल्ला ने घडसाना का दौरा तो किया लेकिन जयपुर के महापडाव में नजर नही आए।
जयपुर में किसानों के सामने सरकार झुकी व कामरेडो की जीत हुई। कांग्रेस को अपने ही ढुलमुल रवैये पर अफसोस हुआ। इस स्थिति ने काँग्रेस को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि काँग्रेस की भूमिका इस आन्दोलन में स्पष्ट होती तो राजनैतिक फायदा अधिक हो सकता था।
अजमेर समझौते के बाद ठण्डी पडी आग आज वापस जल चुकी है। और इस बार कांग्रेस खुलकर मैदान में हैं। प्रदेश अध्यक्ष डॉ.बी.डी.कल्ला किसानों के बीच हैं। ६ डीडी गांव में कल्ला चन्दूराम के शव को लिए किसानों के साथ बैठे रहे और जयपुर में हुई समझौता वार्ता में भी काँग्रेस ने उपस्थिति दर्ज कराई। डॉ. चन्द्रभान, रघु शर्मा, शंकर पन्नू, विजयलक्ष्मी विश्नोई, गंगानगर काँग्रेस के अध्यक्ष पृथ्वीपाल संधु सहित कांग्रेसी नेता किसानों की आवाज में आवाज मिला रहे हैं।
इसका एक कारण यह भी नजर आता है कि पिछले आंदोलन के सबसे बडे नेता कामरेड श्योपत सिंह दुनिया में नहीं रहे। इन्हीं के नेतृत्व में जयपुर में महापडाव हुआ था। हालाकि आज भी आन्दोलन कामरेडों के हाथ में ही है लेकिन श्योपत सिंह की अनुपस्थिति ने काँग्रेस को एक बडी जगह दे दी है।
कांग्रेस को आखिर अपना रूख इस बार बदलना पडा। मांग वहीं है जो पिछली बार थी लेकिन काँग्रेस के स्वर पिछली बार से ज्यादा मुखर है। कारण है कि कग्रेस को आखिर अपनी उपस्थिति का अहसास करवाना ही पडेगा और मुख्य विपक्ष की भूमिका निभानी पडेगी।
इसका एक कारण यह भी नजर आता है कि गंगानगर का इलाका कामरेडो का प्रवेश द्वार बन चुका हैं। पिछले आंदोलन के बाद पंचायत चुनावों में यह परिणाम देखने को भी मिला। अनूपगढ पंचायत समिति में पवन दुग्गल कम्युनिस्ट पार्टी के प्रधान बने। कम्युनिस्ट कोई भी मौका छोड नहीं रहे हैं। सीताराम येचुरी, सांसद निलोत्पल बसु सहित भारत भर के कम्युनिस्टों की नजर रावला, घडसाना आन्दोलन पर है। कम्युनिस्टों को पता है कि राजस्थान में प्रवेश करने का यह अच्छा मौका है।
कांग्रेस यह सोचने पर मजबूर हो गई कि यह इलाका जो कांग्रेस का गढ है व काँग्रेस पार्टी का यहाँ अच्छा आधार है। वर्तमान विधान सभा में भी बीकानेर, श्रीडूंगरगढ सहित कईं ईलाके हैं जहां काँग्रेस के विधायक हैं। अतः काँग्रेस इस क्षेत्र को अनदेखा नहीं कर सकती। कामरेडो के बढते वर्चस्व ने कांग्रेस की नींद उडा दी और यही कारण है कि वर्तमान में कांग्रेस खुलकर मैदान में आई।
यह भी सर्वविहित है कि जहां-जहां कम्यूनिस्ट हावी हुए हैं। वहां-वहां नुकसान कांग्रेस को हुआ हैं, बीजेपी को नही। इसी राजनैतिक सेाच के कारण भाजपा व भाजपा शासित सरकार आंदोलन के प्रति गंभीर नजर नहीं आती। भाजपा जानती है कि इस आंदोलन से भाजपा को ज्यादा राजनैतिक नुकसान नहीं होगा। भाजपा जानती है कि कांग्रेस के लिए यह आन्दोलन राजनैतिक रूप से ज्यादा खतरनाक हो सकता है इसीलिए भाजपा गंभीर नहीं हैं। अनूपगढ क्षेत्र से भाजपा का विधायक है व इसी क्षेत्र के सुरेन्द्र पाल सिंह टीटी भाजपा के प्रदेश स्तर के बडे नेता है, वो जनता के बीच जाना ही पसंद नहीं कर रहे हैं। भाजपा आन्दोलन को लेकर गंभीर नहीं हैं।
कांग्रेस को अपना भविष्य नजर आ रहा है और इसी कारण उसकी सोच में परिवर्तन आया हैं व कांग्रेस इस आंदोलन का नेतृत्व अपने हाथों में लेने का प्रयास कर रही है ताकि कम्युनिस्टों के बढते वर्चस्व को रोका जा सके और काँग्रेस को आन्दोलन का राजनैतिक फायदा मिले।
अब देखना यह है कि पानी की इस राजनीति में किस पार्टी को कितना फायदा मिलता है और किसको कितना नुकसान होता है। फिलहाल काँग्रेस व कामरेड अपना पूरा जोर इस पानी को खेने में लगा रहे हैं।


श्याम नारायण रंगा प्रबन्ध सम्पादक




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Comments to this Article

good, shivpal khyalia (6/10/2008 11:46:59 PM)


mje sab pata h..., Devender (1/31/2010 7:14:29 PM)


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