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Hindu Fast and Festival
गणगौर का त्यौंहार राजस्थान में बडे धूमधाम से मनाया जाता है। जयपुर, बीकानेर, चुरू, नागौर सहित राजस्थान के कई जिलों में गणगौर की सवारी शाही लवाजमें के साथ गाजे बाजे से निकाली जाती है। घर घर में लडकियाँ और नववधू महिलाऍं गणगौर की पूजा करती है और अपने सुहाग व परिवार की खुशहाली की कामना करती है। गणगौर का यह त्यौंहार राजस्थान की संस्कृति में रचा बसा है। शिव पार्वती के इस रूप की पूजा व अर्चना बीकानेर में महिलाओं के साथ पुरूषों के द्वारा भी भक्ति व श्रद्धा... बसंती बयार के इस फाल्गुन माह में जीवन की एक अलग ही उमंग होती है। जीवन के रंगों को दर्शाता यह महीना अपनी अल्हडता व मस्ती के लिए पूरी दुनिया में विशेष अंदाज में जीया जाता है। भारत में फाल्गुन माह में रंगों का त्यौंहार ’होली‘ अपना विशेष स्थान रखता है। वैसे तो ’ब्रज की लट्ठमार होली‘ पूरी दुनिया में अपनी अलग पहचान रखती है लेकिन राजस्थान के बीकानेर की होली भी अपने अंदर मस्ती, उल्लास के साथ साथ परम्परा के विशिष्ट रंग लिए हुए हैं। आईए डालते...
...जहां पत्थरों, कंडों और अंगारों से खेली जाती है होली
ऋतुराज बसंत जब मानव सहचरी प्रकृति को हरितिमा प्रदान कर श्रृंगारित करता है तब अहर्निश आजीविकार्जन की चिंता से दबे मानव मन को श्रृंगारित करने के लिए व्यंय-विनोद, हंसी-ठिठौली का एकमात्र मनमौजी त्यौहार होली ही तो आता है। सामाजिक सद्भाव के साथ मनाए जाने वाले लोकोसव होली को राजस्थान के दक्षिाांचल डूंगरपुर-बांसवाड़ा जिले में जितना धूमधाम से मनाया जाता है उतना शायद ही किसी अन्य पर्व को , जिसका मुख्य कारण बड़ी तादाद में इस पर्व पर संपादित... भुवनेश्वर का रंगपंचमी मेला ... जहाँ थिरकती हैं फागुनी लोक लहरियाँ संदर्भः रंग पंचमी मेलाः 15 मार्च 2009 वागड अंचल में होली केवल एक-दो दिन उत्सव मना लेने की औपचारिकता तक सीमित नहीं है बल्कि पूरे पखवाडे भर तक फागुन की धूम रहती है और अरावली की पर्वतीय उपत्यकाओं पर फागुनी रसों और लोक रंगों का उन्मुक्त लीला विलास प्रेम और श्रृंगार की भावभूमि पर थिरकता रहता है। होली पखवाडे के अन्तर्गत समूचे वागड अंचल में फागुनी अन्दाजों भरे परंपरागत लोक नृत्यों, सामूहिक गैर नृत्यों और लोकानुरंजक लोक समारोहों की फिजाएं परवान चढती हैं। इन्हीं में होली के बाद की पंचमी...संदर्भः रंग पंचमी होली मेलाः 15 मार्च 2009
होली के बाद की पंचमी गुजरात और मध्यप्रदेश की सरहदों से छूते राजस्थान के दक्षिणी सिंहद्वार आदिवासी बहुल वागड अंचल के लिए रंगों और रसों की बारिश का दिन होता है। इस दिन बांसवाडा और डूँगरपुर क्षेत्र में हर कहीं होली और फागुनी मस्ती का ज्वार उमडता है।
रंगपंचमी का दिन नृत्योल्लास का वार्षिक महापर्व होता है जब ग्राम्यांचलों में हर कहीं फागुनी लोक नृत्यों और गैर-डाण्डिया नाच-गान की लोक लहरियों पर पर्वतीय उपत्यकाएँ झूमने लगती हैं।
डूंगरपुर जिले की बिछीवाडा पंचायत समिति... होली का त्यौंहार। भारतीय संस्कृति में रंगों का त्यौंहार। होली का नाम आते ही एक मस्ती एक उमंग मन में छा जाती है और लगता है जैसे सारी कायनात ही रंगों में खिल उठी है। क्या है होली और क्यों मनाते हैं होली का त्यौंहार। आईये कुछ पडताल इस बारे में ः-
एक तो एक सर्वज्ञात तथ्य है कि होलीका राक्षस हरिण्यकश्यप की बहन थी जो अपने ही भतीजे व हरिण्यकश्यप के पुत्र प्रहलाद को मारना चाहती थी। होलीका प्रहलाद को मारने के लिए आग में बैठी और होलीका को वरदान था कि वह... जिस मास में सूर्य संक्रान्ति नही होती उसे अधिमास ( मल मास या पुरूषोत्तम मास ) कहते हैं । अधिमास ३२ मास १६दिन तथा चार घडी में अन्तर से आता हैं। अधिमास में फल-प्राप्ति की कामना से लिए जानेवाले सभी कार्य वर्जित हैं ।
इस महीने में दान पुण्य करने का फल अक्षय होता है। यदि दान न किया जा सके तो ब्राह्यणो तथा सन्तो की सेवा सर्वोत्तम मानी गई हैं । दान में खर्च किया गया धन क्षीण नही होता । उत्तरोतर बढता ही जाता हैं । जिस प्रकार छोटे से बट बीज से विशाल... चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी पापमोचनी एकादशी के रूप म मनायी जाती है। इस दिन भगवान विष्णु का पुजन किया जाता हैं ।
कथाः प्राचीन समय मे चित्ररथ नामक एक रमणीक वन था । इस वन में देवराज इन्द्र गर्न्धव कन्याओं तथा देवताओं सहित स्वच्छन्द विहार करते थें । मेंधावी नामक ऋषि भी वहाँ पर तपस्या कर रहे थे । ऋषि शिव उपासक तथा अप्सराएँ शिव द्रोहिणी अनंग दासी (अनुचरी) थी । एक बार कामदेव ने मुनि का तप भंग करने के लिए उनके पास मंजुघोषा नामक अप्सरा को भेजा । युवावस्था वाले मुनि... बसोडा का त्यौहार होली के सात आठ दिन बाद अर्थात चैत्र कृष्ण पक्ष में प्रथम सोमवार या बृहस्पतिवार को मनाया जाता है इस दिन बासी भोजन ( एक दिन पहने बना ) खाया जाता हैं । बसोडा के दिन सुबह एक थाली में रबडी, रोटी, चावल, रोली, मोली, मूँग, मूँग के छिलके वाली दाल, हल्दी, धुपबती एक गुलरी ( बडकुल्ला) की माला जो होली के दिन मालाये बचाई थी आदि रख लेना चाहीए ।
इस सामान को घर के सभी प्राणियो के हाथ लगवा कर शीतला माता पर भेज देना चाहीए । रास्ते में शीतला माता... होली का पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता हैं । होली से आठ दिन पहले से होलाष्टक प्रारम्भ होते हैं । होलाष्टक के दिनो में कोई भी शुभ कार्य करना वर्जित हैं ।
होली एक सामाजिक पर्व हैं । यह रंगो का त्यौहार हैं । इस पर्व को सब वर्ण के लोग आपस का भेदभाव मिटाकर बडे उत्साह से मनाते हैं । इस दिन सांयकाल के बाद भद्रा रहित लग्न मे होलिका दहन किया जाता हैं । इस अवसर पर लकडयो तथा घास फूस का बडा भारी ढेर लगाकर होलिका पूजन करके उसमे आग... श्याम जी की जात फाल्गुन की शुक्ल पक्ष की द्वादशी को लगती हैं ।
विधान ः घर के आँगन मे गोबर से एक स्थान लीपकर उस पर मिट्टी बिछाएँ । उसके ऊपर घी का दिपक जलाएँ। रोली, चावल, जल, फूल, तथा नारियल आदि चढाकर पूजर करें रोली का टीका माथे पर लगाएँ। इसके बाद दोनो हाथ जोडकर दण्डवत प्रणाम करें इसके बाद ब्राह्यण को भोजन कराने बाद घर के सब लोग प्रसाद ग्रहण कर भोजन करें । ... आमल की एकादशी फालगुन मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनायी जाती है। आँवले के वृक्ष में भगवान का निवास होता हैं इसलिए इस दिन आँवले के वृक्ष के नीचे बैठकर भगवान का पूजन किया जाता हैं ।
कथा ः प्राचीन काल में भारत में चित्रसेन नामक राजा राज्य करता था । उनके राज्य में एकादशी व्रत का प्रचलन था । प्रजा एवं राजा एकादशी का व्रत रखते थें । एक दिन राजा चित्रसेन शिकार खेलते खेलते दूर निकल गए । वहाँ पर जंगली जातियो ने उन पर आक्रमण कर दिया । उनके शस्त्रो अस्त्रो... महाशिव रात्रि का व्रत फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को किया जाता है ।
विधानः त्रयोदशी को एक बार भोजन करके चतुर्दशी को दिन भर निराहार रहता पडता है । पत्र पुष्प तथा सुन्दर वस्त्रो से मंडप तैयार करके वेदी पर कलश की स्थापना करके गौरी श्ंाकर की स्वर्ण मुर्ति तथा नन्दी की चाँदी की मुर्ति रखनी चाहीए । कलश को जल से भरकर रोली, मोली, चावल, पान, सुपारी, लौंग, इलायची, चन्दन, दूध, घी, शहद, कमलगट्टा, धतुरा,बेल पत्र आदि का प्रसाद शिव को अर्पित करके पूजा करनी चाहीए । रात को जागरण करके चार... ”विजया एकादशी“ का व्रत फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को रखा जाता हैं । इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है । पूजन में धूप, दीप, नैवेद्य, नारियल आदि चढाया जाता है ।
कथाः इस दिन भगवान राम लंका पर विजय प्राप्त करने के लिए समुद्र तट पर पहुचे थे । समुद्र ने जब श्रीराम को मार्ग नही दिया तो भगवान श्रीराम ने ऋषियो से उपाय पूछा । ऋषियो ने बताया की हम प्रत्येक शुभ कार्य को शुरू करने से पहले व्रत आदि अनुष्ठान करते है । आप भी फाल्गुन कुष्ण एकादशी... फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की नवमी को माता सीता का जन्म हुआ था । इसलिए इस दिन समस्त सुहाग सामग्री के साथ माता सीता का पूजन करते है । पूजन सामग्री में चावल, जौ,तिल आदि से हवन किया जाता हैं । इस व्रत को करने से सन्तान लाभ होता हैं । तथा सभी मनोकामनाएँ पूरी होती है ।
” अचल रहे अहिवाता तुम्हारा ।
जल लगि गंगा यमुना जल धारा।।“
ऊपर वर्णित वाक्यो से पार्वती ने सीता को आशीर्वाद दिया था । उसी दिन सीताजी इस व्रत को करने वाली स्त्रियो का आशीर्वाद देती... पुरा माघ मास प्रयाग में कल्पवास करके त्रिवेणी स्नान करने का अन्तिम दिन माघ पूर्णिमा ही है । इस दिन यज्ञ, तप तथा दान का विशेष महत्व हैं। स्नान आदि से निवृत होकर भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहीए । पितरो का श्राद्ध भी करना चाहीए । गरीबो को भोजन, वस्त्र, तिल, कम्बल, गुंड, कपास, घी, लड्डु, फल, अन्न, खडाऊँ आदि का दान करना चाहीए ।
... कहतेहै कि माघ मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को भीष्म पितामह ने अपने शरीर को छोडा था । इसलिए इस दिन उनका निर्वाण दिन है । जो भीमाष्टमी के रूप में मनाया जाता है । इस दिन भीष्म पितामह के निमित्त तिलो के साथ तर्पण तथा श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को सन्तान प्राप्त होती हैं ।
कथाः भीष्म पितामह का असली नाम देवव्रत था । वह शान्तनु की पटरानी गंगा की कोख से उत्पन्न हुए थे । एक बार राजा शान्तनु शिकार खेलते खेलते गंगा के तट पार चले गए । लौटते समय नाव उनकी... माघ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को जया एकादशी कहते है ।
विधान ः भगवान श्रीकृष्ण की पुष्प, जल अक्षत, रोली तथा विशिष्ट पदार्थो से पुजा करनी चाहीए । भगवान को भोग लगाकर... माघ मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी को सुर्य सप्तमी के रूप में मनायी जाती है इस दिन सुर्य भगवान को गंगाजल से अर्ध्य देते है । दीपक, कपुर, धूप, लाल, पुष्प आदि से सुर्य भगवान की स्तुति करते है ।
सूर्य की ओर मुख करके स्तुति करनी चाहीए । इससे शारीरिक चर्म रोग दूर हो जाते ह । प्राचीन ज्योतिष शास्त्र तथा आधुनिक विज्ञान में सूर्य का बडा महत्व है । जीवो तथा वनस्पतियो में जीवन प्रदान करने वाला सूर्य ही माना जाता हैं । इस दिन सूर्य पुराण करना चाहीए । सूर्य का सारथी... माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को बसन्त पंचमी रूप में मनाते है। यह दिन ऋतुराज बसन्त के आगमन की सुचना देता है । इस दिन भगवान विष्णु तथा सरस्वती की पूजन किया जाता है । बसन्त पंचमी के दिन घरा में केसरिया चावल बनाये जाते हैं तथा पीले कपडे पहनते है । बच्चे पंतग उडाते है ।
कथा ः भगवान विष्णु की आज्ञा से प्रजापति ब्रह्याजी सृष्टि की रचना करके पृथ्वी पर आये तो उन्हे चारो और सुनसान तथा निर्जन दिखाई दिया । उदासी से सारा वातावरण मुक सा हो गया था । जैसे... माघ मास की अमावस्या के रूप में मनायी जाती हैं । इस अमावस्या का मौन रखते हैं । इसलिए इस मौनी अमावस्यास कहते हैं । कहते है कि सृष्टि के सचांलक मनु का जन्म दिन भी इसी अमावस्या को हुआ था । अनेक प्राणी माघ मास में प्रतिदिन संगम में स्नान करते हैं । माघ मास का सबसे अधिक महत्वपुर्ण पर्व अमावस्या ही है ।
... यह माघ मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी के रूप में मनाई जाती है । इसमे छः प्रकार के तिल प्रयोग होने के कारण इसे षट्तिला एकादशी कहते है । पंचामृत में तिल मिलाकर पहले भगवान विष्णु को स्नान कराया जाता । इस दिन तिल मिश्रित भोजन करतेहै । दिन मे हरि किर्तन का कर रात्रि को भगवान की प्रतिमा के सामने सोना चाहीए ।
कथा ः प्राचीन काल में वाराणसी मे एक गरीब अहीर रहता था । वह जंगल मे लकडी काटकर बेचने का काम करता था । जिस दिन उसकी लकडी न बिकती... यह व्रत माघ मास की कृष्ण की षष्ठी तिथी को रखा जाता है इस दिन स्त्रियाँ ठण्डे ताजे जल मे स्नान करती है । भोजन भी ठंडा ही करा जाता है । इसका महत्व बंगाल प्रान्त में अधिक है । शीतला माता की षोडशोपचार पूजा करके पापो के दमनार्थ प्रार्थना की जाती है ।
कथाः किसी व्यापारी के सात पुत्र थे । सातो विवाहित थे परन्तु सन्तान किसी के भी नही हुई । एक वृ¬द्ध स्त्री कहने पर व्यापारी की पत्नी एव सातो पुत्र बधुओ ने शीतला माता का षष्टी के दिन व्रत किया। शीतला माता... सकट चौथ का त्यौहार भी माघ मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है । इस दिन संकट हरण गणपति गणेश का पूजन होता है । इस दिन पुत्रवति स्त्रियाँ दिनभर निर्जल रहकर शाम को फलाहार करती है । तथा सकट माता पर पुरी पकवान चढाती है । तथा कथा सुनती है । इस दिन तिल को भून कर गुंड के साथ कुटा जाता है । इससे तिलकुट का पहाड बनाया जाता है । कही कही तिलकुट का बकरा बनाकर उसकी पूजा करके घर का कोई बालक उसकी चाकू से गर्दन काटता है । कथा... गणेश चतुर्थी का व्रत मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी पुत्रदा एकादशी
यह व्रत पौष माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को रखा जाता है इस व्रत में भगवान विष्णु की पूजा का विधान है । इस व्रत मे सन्तान की प्राप्ति होती है।
कथाः भद्रावती नगर में एक समय राजा सुकेतू का राज्य था । उसकी पत्नी का नाम शैव्या था । उनके सन्तान न होने के कारण वे बडे दुःखी रहते थे । एक दिन दोनो राजा रानी मंत्री को राजपाट सौपकर वन को चले गये । उनके मन मे आत्महत्या करने का... |
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