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| RSS | 13 March 2010 |
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यह सत्य है कि सिमी का नाम देश में पहली बार उस समय चर्चा में आया जबकि देश में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार सत्ता में थी तथा लाल कृष्ण अडवाणी देश के गृहमंत्री थे। उस समय सिमी पर न सिर्फ पहली बार प्रतिबंध लगा बल्कि बडे पैमाने पर संदेहपूर्ण सिमी नेताओं की धरपकड भी की गई। परन्तु इस कवायद का नतीजा कुछ भी न निकला। तब से लेकर अब तक देश में होने वाले अनेकों आतंकवादी हमलों तथा आतंकवादियों द्वारा किए जाने वाले बम विस्फोटों में कई बार सिमी का नाम घटना के तत्काल बाद सामने आता रहा है। परन्तु आश्चर्यजनक यह है कि राज्य सरकारें अथवा सुरक्षा एजेंसियां सिमी के विरुद्घ अब तक कोई भी ऐसा प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सकी हैं जिससे कि सिमी को आतंकवादी संगठन करार देते हुए उसपर प्रतिबंध जारी रखा जा सके। इसी दलील के आधार पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने सिमी पर लगा प्रतिबंध हटाए जाने का आदेश जारी किया था।
प्रश्ा* यह है कि किसी संगठन को प्रतिबंधित करने हेतु क्या मात्र उनपर आरोप लगना ही काफी होता है अथवा इसके लिए पर्याप्त मात्रा में प्रमाण व साक्ष्य भी आवश्यक होते हैं। गत् दिनों उच्च न्यायालय द्वारा जिस दिन सिमी से प्रतिबंध हटाए जाने की घोषणा की गई, उसी समय तत्काल रूप से देश के दो प्रमुख नेताओं के बयान इसी विषय को लेकर मीडिया में प्रसारित किए गए। पूर्व केंद्रीय रक्षा मंत्री तथा समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव तथा रेल मंत्री एवं राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने सिमी पर दिए गए उच्च न्यायालय के निर्णय को ठीक बताया परन्तु दोनों ही नेताओं ने अपने अलग-अलग वक्तव्यों में परन्तु एक ही स्वर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तथा उसके सहयोगी बजरंग दल, दुर्गावाहिनी आदि पर भी प्रतिबंध लगाए जाने की मांग की। इन नेताओं का तर्क था कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की भी इस देश में साम्प्रदायिक दुर्भावना फैलाने तथा साम्प्रदायिक आतंकवाद फैलाने में प्रमुख भूमिका है। बेशक आज इस्लामी जेहाद के नाम पर फैलने वाला आतंकवाद हमारे देश में अपनी जडें मजबूत करने की फिराक में है। देश में होने वाली आतंकवादी घटनाओं से भी यही पता लगता है कि इनमें मुस्लिम समुदाय से संबंध रखने वाले लोगों की ही प्रायः शिरकत रहती है। चाहे वे सीमा पार के हों या फिर कश्मीर अथवा देश के किसी अन्य भाग के। परन्तु आतंकवाद फैलाने अथवा साम्प्रदायिक दुर्भावना फैलाने का ठीकरा मात्र किसी एक संगठन अथवा एक समुदाय के सिर पर फोडने की कोशिश को कदापि उचित नहीं कहा जा सकता। देश जानता है कि स्वतंत्र भारत में सबसे पहली राजनैतिक हत्या स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के रूप में सामने आई थी। गांधीजी को न तो किसी मुसलमान ने मारा था न ही किसी सिमी जैसे तथाकथित साम्प्रदायिक अथवा इस्लामिक जेहादी संगठन द्वारा उनकी हत्या कराई गई थी। बल्कि साबरमती के उस महान संत को घोर हिन्दुत्ववादी विचारधारा रखने वाले नाथू राम गोडसे द्वारा एक मंदिर जैसे पवित्र धर्मस्थल के प्रांगण में शहीद कर दिया गया था। दुर्भाग्यवश देश में होने वाली राजनैतिक हत्याओं का वह सिलसिला तब से आज तक जारी है। देश में फैलने वाले ऐसे राजनैतिक आतंकवाद का आखिर कौन था सूत्रधार? ऐसे व्यक्ति, ऐसी विचारधारा का प्रसार करने वाले संगठन को राष्ट्रभक्त होने का प्रमाण पत्र दिया जाना चाहिए अथवा राष्ट्रद्रोही होने का? गांधीजी का कुसूर सिर्फ यह था कि वे धर्म निरपेक्षतावादी थे तथा भारत में बसने वाले हिन्दू व मुसलमान दोनों ही कौमों को भारतमाता की दो आंखों की संज्ञा देते थे। परन्तु साम्प्रदायिकता एवं साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति करने वाले लोगों को गांधीजी का धर्म निरपेक्षता का फार्मूला रास न आया और आखिरकार वे स्वयं हिन्दू होते हुए भी एक कट्टरपंथी हिन्दुत्ववादी व्यक्ति की गोली का शिकार हो गए। इसी जहरीली साम्प्रदायिकता का प्रदर्शन इसी विचारधारा के लोगों द्वारा उडीसा में एक दशक पूर्व उस समय किया गया था जबकि एक ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स तथा उसके दो बच्चों को उन्हीं की गाडी में जिन्दा जला दिया गया था। वह व्यक्ति भी गिरफ्तार किया गया तथा उसे अदालत द्वारा देाषी भी पाया गया। यह शर्मनाक आतंकवादी घटना भी एक विशेष विचारधारा रखने वाले संगठन से प्रेरित थी। ठीक उसी प्रकार जैसे कि महात्मा गांधी की हत्या। इतने बडे अपराध करने वाले संगठनों को आखिर देशभक्त होने का प्रमाण पत्र कैसे दिया जा सकता है। क्या ऐसी साम्प्रदायिक विचारधारा फैलाने वाले संगठन आतंकवादी संगठनों की श्रेणी में नहीं आते? तमिलनाडू, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में कई आपराधिक व आतंकी घटनाओं में ऐसे साम्प्रदायिक संगठनों की भूमिका निरंतर पाई जा रही है। हमारे देश में अदालतें साक्ष्यों, प्रमाणों तथा गवाही के आधार पर किसी मुजरिम को दोषी करार देती है। अतः केवल दुर्भावना के आधार पर आरोप-प्रत्यारोप लगाना अथवा किसी समुदाय विशेष को निशाना बनाने के लिए बहानों की तलाश करना हरगिज मुनासिब नहीं है। सिमी हो अथवा जमाअत-ए-इस्लामी अथवा जमीअतुल उल्माए हिन्द या फिर और कोई इस्लामिक संगठन अथवा इनसे जुडा कोई भी व्यक्ति यदि आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्त पाया जाए तथा अदालत इसके लिए पर्याप्त साक्ष्य व प्रमाण रखती हो तो ऐसे संगठनों के किसी भी प्रमाणित मुजरिम को निःसन्देह फांसी पर लटका दिया जाना चाहिए। इतना ही नहीं बल्कि ऐसे संगठनों को प्रतिबंधित भी कर दिया जाना चाहिए। परन्तु गांधीजी की हत्या से लेकर गांधी के गुजरात तक साम्प्रदायिकता व आतंकवाद का नंगा नाच करने वालों को भी कतई नहीं बख्शा जाना चाहिए। साम्प्रदायिकता के जहर ने ही आज कश्मीर से कन्याकुमारी तक अस्थिरता एवं अराजकता का एक घिनौना व अफसोसनाक वातावरण पैदा कर दिया है। ऐसी विचारधारा का प्रसार करने वाले संगठनों को अविलंब प्रतिबंधित किए जाने तथा इनसे जुडे नेताओं को जेल की सलाखों के पीछे तत्काल भेजे जाने की आवश्यकता है। देश की एकता व अखंडता के लिए वर्तमान समय में यही सबसे जरूरी कदम होगा। Nirmal Rani nirmalrani@gmail.com Discuss this article on KhabarExpress Forum Comments to this Article Be the first to comment on this Article |
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