बीकानेर के स्थापत्य-शिल्प का इतिहास विगत पांच शताब्दियों का है। इस समयावधि के दौरान बीकानेर में स्थापत्य की दृश्टि से समुचित और सर्वतोमुखी विकास हुआ। विष्व प्रसिद्ध थार मरूस्थल के हृदय प्रदेष में अवस्थित होने के कारण बीकानेर जहां बाहृ आक्रमणों से अपेक्षाकृत सुरक्षित रहा वहीं अपनी दुर्गम मरूभूभागीय स्थिति के कारण उत्तर मुगलकाल में हो रही विनाषकारी मरहठो और पण्डारियों की लूटमार से भी बचा रहा। यहां विद्यमान रही समुचित न्याय-व्यवस्था एवं राज्याश्रय ने यहां के कर्मठ और जनसेवा भावी श्रेश्ठी वर्ग को देष के अन्य भागो से अर्जित धनसंपदा का सदुपयोग बीकानेर में करने को प्रेरित किया। परिणामतः उन्होने आपसी स्वस्थ प्रतिस्पर्धा में कलात्मक हवेलियां, मंदिर, धर्मषाला, कुएं, बावडी, तालाब आदि स्थापत्य प्रतीकों का निर्माण कराकर बीकानेर के राजा-महाराजाओं द्वारा कराए गए राजसी निर्माण कार्यो को निजी एवंज न उपयोगी निर्माण कार्यो के आयाम से जोड दिया। वस्तुतः बीकानेर के स्थापत्य-प्रतीकों के निर्माण में जितना योगदान बीकानेर के स्थानीय शिल्पी समुदाय का रहा, उतना ही बाहर से आए कलाकारो और शिल्पियों का भी। संभवतः यही कारण है कि स्थानीय और बाहृ कलाकारों तथा स्थापत्य षिल्पियों के समन्वय एवं सामंजस्य युक्त कार्य से यहां एक मिलीजुली और समन्वित नई स्थापत्य शैली विकसित हुई जिसने भारतीय स्थापत्य के इतिहास मे अपना विषिश्ट स्थान बनाया। बीकानेर के प्राचीनतम् स्थापत्य प्रतीकों के रूप में कोडमदेसर के किले के नण्टप्रायः भग्नावशेशों तथा रावबीकाजी की टेक्री पर बनी दो छतरियों को उद्धत किया जा सकता है। जिनकी ऐतिहासिक कला कालान्तर में इन छतरियों पर कराए गये पुर्ननिर्माण कार्य के साथ ही नश्ट हो गई। वि.सं. १५४४ में भाण्डाषाह द्वारा ‘‘त्रैलोक्य दीपक प्रसाद‘‘ (वर्तमान में भाण्डाषाह मंदिर के नाम से विख्यात) का निर्माण प्रारम्भ कर बीकानेर के मंदिर स्थापत्य को एक नई दिषा प्रदान की गई थी। इसकी गणना भी बीकानेर के प्राचीनतम् स्थापत्य प्रतीकों में की जा सकती है।यदि यह कहा जाए तो कोई अतिष्योक्ति नहीं होगी कि बीकानेर वासियों में अपनी ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण की विचारणा न के बराबर रही। संभवतः यही कारण है कि बीकानेर के ऐतिहासिक स्थापत्य प्रतीकों के रूप मे जो भवन, मंदिर, हवेलियां, बगेचियां आदि हमें देखने को मिल रही है वे राव लूणकर्ण के काल से पूर्व की नही है। बीकानेर के छठे नरेष राजा रामसिंह द्वारा निर्मित कराया गया जूनागढ किला अपने दुर्ग स्थापत्य वैषिश्ट्यों के कारण उत्तरी भारत के श्रेश्ठतम् मैदानी किलों मे से एक माना जाता है। इस किले की नींव वि.सं. १६४५ मे रखी गई और इस किले के प्रथम दौर का निर्माण कार्य वि.सं. १६५० मे पूर्ण हुआ। बनावट की दृश्टि से यह एक चतुश्कोण किला है जो लगभग १४ ) फुट चौडी एक चांद पोल नामक दो द्वार है। कहीं कहीं बुर्जो और दीवार में मकानात तथा देवस्थान भी बने हुए है। पष्चिम और दक्षिण की दीवारों में तिमंजिले मकानात बने हुए है। किले के अदंर की भूमि १६३११९ वर्ग गज है। किले की सफील (प्राचीर) पूर्वी ४०१ गज, उत्तरी ४०६ गज, पष्चिमी ४०७ गज और दक्षिणी ४०३ गज है। किले के चारों और २५ फुट गहरी और ऊपर से ३० फुट चौडी खाई है। किले में प्रवेष के लिए पूर्व और पष्चिम में दो बडी प्रोलें (कर्ण पोल और चांद पोल) है। इनके अतिरिक्त पांच पोलें किले के भीतर स्थित है- दौलत पोल, फतह पोल, रतन पोल, सूरज पोल और ध्रुव पोल। संभवतः इस दुर्ग के प्राचीनतम् निर्माणों में से एक निर्माण ‘‘ रायसिंह का चौबारा ‘‘ है। हरमन गोयट्ज ने अपनी पुस्तक ‘‘ आर्ट एण्ड आर्कीटेक्चर ऑफ दी बीकानेर स्टेट ‘‘ में इस दुर्ग के विविध निर्माणों की तुलना मध्ययुगीन दिल्ली तथा आगरा के स्थापत्य प्रतीकों से करते हुए इनमें पारस्परिक साम्य स्थापित करने का प्रयास किया है। इस किले के विविध निर्माण कार्यो में हमें जहां इण्डो-मुगल स्थापत्य कला के वैषिश्ट्रयों का दर्षन होता है वहीं राजपूत स्थापत्य कला की विषेशताओं का दिग्दर्शन भी होता है। सूरजपोल, राय निवास, देवी द्वारा , त्रिपोलिया, सुर मंदिर आदि रायसिंहकालीन निर्माण कार्यो को तद्विशयक उदाहरणों के रूप मे उद्धत किया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि वि.सं. १६३१ से १६६९ के मध्य कर्णसिंह ने जिस करणपोल, दौलत पोल, फतह पोल, और सूरजपोल और सूरजपोल के निर्माणों के अतिरिक्त हरमंदिर और सुर मंदिर के दक्षिणी भाग का विस्तार कराया वह समग्र निर्माण राजा दलपतसिंह द्वारा किए गए किले के दक्षिणी भाग के विस्तार कके बाद के है। महाराजा गजसिंह ने अपने षासन काल के दौरान चन्द्रमहल और फूलमहल के दक्षिणी भाग का निर्माण कराया तो अनूपसिंह द्वारा निर्मित अनूपमहल ने इस किले की ख्याति को सर्वत्र फैला दिया। दिल्ली और आगरा के किलों मे बने ‘दीवाने-खास‘ की स्थापतय षैली पर बने इस महल को अद्वितीय कहा जा सकता है। तत्पश्चात् महाराजा सरदारसिंह के समय में अवष्य कुछ निर्माण कार्य हुआ परंतु फिर उसमें एक ठहराव सा आ गया। कालान्तर में आधुनिक बीकानेर के निर्माता महाराजा गंगासिंह के षासनकाल के दौरान जो निर्माण कार्य कराये गये उनमें गंगा कचेडी, लालगढ पैलेस, विजय भवन, गंगा थिएटर इस रूप में उत्कृश्ट कहे जा सकते है। वैसे महाराजा गंगासिंह द्वारा निर्मित कराए। गए। कतिपय अन्य स्थापत्य प्रतीकों में सादुल क्लब, स्टेडियम, अभिलेखागार भवन, म्यूजियम भवन, पी.बी.एम. हॉस्पीटल भवन आदि भवनों की गणना भी की जाती है। नगर की कतिपय हवेलियां भी बीकानेर के स्थापत्य वैभव का बखान करती दिखाई देती है। इनमें प्रमुख रूप से सहीवालों की हवेलियां, मोहता, डागो और दम्माणी सेठों की हवेलियां, ठढढों कोठारियों की हवेलियां और रामपुरिया सेठों की हवेलियां आदि उल्लिखित की जा सकती है। दुलमेरा के लाल पत्थर पर की गई सूक्ष्म कारीगरी और कलात्मकतायुक्त खुदाई का काम इन हवेलियों के स्थापत्य वैभव मे चार चांद लगा देता है। बीकानेर का मंदिर स्थापत्य वेभव भी कोई कम समृद्ध नही रहा। इस क्रम में नगर के प्रसिद्ध लक्ष्मीनाथ मंदिर, जैन ष्वेताम्बर सुमतिनाथ मंदिर, नेमीनाथ के जैन मंदिर, संतोशी माता मंदिर, धनीनाथजी का पंच मंदिर, राजरतन बिहारी मंदिर, रसिक षिरोमणी मंदिर, दाऊजी मंदिर, देषनोक का करणी माता मंदिर और षिवबाडी मंदिर आदि मंदिरों को विषेश रूप से उद्धत किया जा सकता है। सारांषतः यह कहा जा सकता है कि बीकानेर स्थापत्य वैभव अपने आप में अनुपम एवं उत्कृश्टता के उच्चतम् मानदण्डों को स्पर्ष करता हुआ है।
Discuss this topic on KhabarExpress Forum
|