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गत दो वर्षो से भारत में ही नहीं पाकिस्तान में लोग क्रिकेट से दूर हो रहे थे ऐसा लग रहा था क्रिकेट का पर्याय आस्ट्रेलिया है। टेस्ट क्रिकेट और एकदिवसीय क्रिकेट सभी जगह आस्ट्रेलिया का बोलबाला था। भारत और पाकिस्तान के वनडे विश्वकप से पहले दौर में बाहर हो जाने के बाद दोनो देशो में क्रिकेट एक उबाउ विषय हो गया था। ऐसा लग रहा था कि क्रिकेट की लौ जा रही थी परन्तु महेन्द्रसिंह धोनी के भारतीय क्रिकेट टीम की बागडोर संभालते ही मानो क्रिकेट में नूर आ गया । जोहान्सबर्ग में माही की टीम में ईग्लैण्ड, दक्षिण अफ्रीका, आस्ट्रेलिया और पाकिस्तान को पराजित इतिहास रच दिया। सौरव, द्रविड और सचिन के बाद माही ने भारत को क्रिकेट के नये फॉरमेट का विश्वविजेता बना दिया। देशवासियों को तिरंगा लहलहाने का अवसर दे दिया। पूरा देश मानो झूम झूम कर कह रहा हो माही तुम आ गये हो नूर आ गया है।
भारत के विश्वकप जीतने का अर्थ केवल मात्र यह नहीं है कि क्रिकेट में हम २४ साल बाद विश्वचैम्पियन बन गये बल्कि इसके* और कई मायने है। भारतीय क्रिकेट १९९० के बाद बिलकुल बदल गई । हर एक सीमित ओवरो की प्रतियोगिता में चैम्पियन रहने वाली भारतीय टीम १९९० के बाद फिसड्डी रहने लग गई। सचिन, अजहर, सौरव, द्रविड और सिद्धृ जैसे बडे खिलाडी क्रिकेट की किसी भी बडी प्रतियोगिता में भारतीय टीम के चैम्पियन बनने के साक्षी नहीं बन सके। इस दौरान आस्ट्रेलिया ने क्रिकेट को पूरी तरह से पकड लिया । ऐसा लग रहा था कि आस्ट्रेलिया को हराना नामूमकिन है। परन्तु महेन्द्रसिंह धोनी की युवा टीम ने सारा परिदृश्य बदल दिया। टीम ने एक जुट होकर प्रदर्शन किया। टीम ने अपनी मारक क्षमता को प्रदर्शित किया और अंतिम गेंद तक संघर्ष किया जिसका परिणाम यह हुआ कि भारत ने छोटै स्कोर के सभी मैच जीते। टीम योजना बनाकर खेली । हर मैच से पूर्व गेम प्लान बनाया गया और वह प्लान काम्याब रहा। इस रणनीति के आगे आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका और ईग्लैण्ड जैसी टीमे धराशायी हो गयी। धोनी की टीम ने दिखा दिया है कि क्रिकेट किसी एक देश की बपौती नहीं है और क्रिकेट में किसी भी टीम को हराया जा सकता है। आज एशिया महाद्वीप में एक बार फिर क्रिकेट में नूर आ गया है। भारत और पाकिस्तान दोनो टीमो ने एशिया उपमहाद्वीप में फिर से विश्वास कायम किया है कि क्रिकेट में हमारा कोई मुकाबला नहीं है। अब एक बार फिर भारतीय उपमहाद्वीप में क्रिकेट गली मोहल्लो तक जायेगा और क्रिकेट में नई क्रांति आयेगी।
महेन्द्रसिंह धोनी ने क्रिकेट को नई सोच दी हे। अब तक क्रिकेट में कप्तान को तानाशाह का प्रतीक माना जाता था। क्रिकेट में कप्तान को सर्वोपरी मानना क्रिकेट का अनुशासन कहलाता था। धोनी ने इस सोच को बदला। उसकी टीम में सभी खिलाडी कप्तानी का हिस्सा थे। वह निर्णय टीम के सदस्यो पर थोपता नहीं है बल्कि निर्णय पर उनकी सहमति लेता है। टीम के सभी सदस्य सामूहिक जिम्मेदारी महसूस करते थे। मैदान में हर एक सदस्य को एक एक रन बचाते हुए देखा जा सकता था। हर एक खिलाडी कप्तान और गेंदबाज को सलाह देने के लिए तैयार था और कप्तान उसकी सलाह को तवोज्जह दे रहा था। ऐसा दृश्य क्रिकेट में यदा कदा ही देखने को ही मिलता था। धोनी ने क्रिकेट में प्रजातान्त्रिक सोच को जन्म दिया है। महेन्द्र सिंह धोनी ने अपने सीमित साधानो का बुद्धिमतापूर्वक उपयोग किया। धोनी ने आरपीसिंह , हरभजन सिंह* और श्रीसंत जैसे मुख्य गेंदबाजो के ओवरर्स का उपयोग विपक्षी टीम के महत्वपूर्ण विकेट लेने के लिए किया और इनके ओवर पहले ही समाप्त कर विपक्षी टीम को दबाव में डाला तथा अंतिम ओवर साधरण गेंदबाज* जोगिन्दरसिंह से करवाकर जोगिन्दर* में विश्वास पैदा किया। उसकी कप्तानी प्रबध्ंान के लिए भी एक पाठ है।
ट्वन्टी २० विश्वकप में भारत का चैम्पियन बनना एशिया उपमहाद्वीप के लिए वरदान सिद्ध होगा। अब एक बार फिर इस उपमहाद्वीप में क्रिकेट की दीवानगी देखने को मिलेगी। भारतीय टीम में १९९६ से २००३ तक वनडे विश्वकप में लगातार एशिया टीमो की हार और आस्ट्रेलिया की लगातार सफलता से इस क्षेत्र में क्रिकेट से लोग दूर हो रह थे। भारत के टृवन्टी २० विश्वकप जीतते ही इस क्षेत्र में क्रिकेट में नूर आ गया है नहीं तो क्रिकेट से लौ जा रही थी।
मनीष कुमार जोशी
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